Saturday, 12 December 2015

में भी बदलूँगा वक़्त कि रफ्तार के साथ
पर जब भी मिलूंगा अंदाज पुराना होगा…
ज़माना बहुत तेज़ चलता है भाई लोग . . .

जिंदगी की रफतार इस तरह बनाओ की
,कोई दुश्मन आगे नीकल जाए तो चलेगा..
लेकिन कोई दोस्त पीछे ना छुट जाए...
गलती सुधरने का मौक़ा उसी दिन बंद हो
गया था,
जिस दिन हाथ में पेंसिल की जगह पेन थमा
दिया गया था.....
“सबके कर्ज़े चुका दूं मरने से पहले, ऐसी मेरी
नियत है,
मौत से पहले तू भी बता दे ज़िन्दगी, तेरी
क्या कीमत है”
आज तक बहुत भरोसे टूटे, मगर भरोसे की
आदत न छूटी !!
बातों से सीखा है हमने आदमी को पहचानने
का फन,
जो हल्के लोग होते है,हर वक्त बातें भारी
भारी करते हैं...
संभाल के रखना अपनी पीठ को
दोस्तों....
शाबाशी हो या ख़ंजर के
निशान..दोनों पीठ पर ही मिलते हैं!
कुछ शिकायत बनी रहे, रिश्तों में ठहराव
के लिये,
बहुत चाशनी में डूबे रिश्ते वफादार नहीं
होते...: कितने अनमोल है,यह रिश्ते,

जानते नही किसी को फिर भी सभी अपने
ही लगते है..
ख्वाहिश भले छोटी सी हो लेकिन,
उसे पूरा करने के लिए “दिल” ज़िद्दी सा
होना चाहिए..
कभी ना कहो कि दिन अपने खराब हैं,
समझ लो कि हम काँटों से घिर गये गुलाब
है..!!
बचपन भी कमाल का था खेलते खेलते चाहें
छत पर सोयें या ज़मीन पर,,,
आँख बिस्तर पर ही खुलती थी...
हम किसी भी गली से गुजरते है...
तो लाईन देने वाली लडकियाँ कम और
इज्जत देने वाले दोस्त ज्यादा मिलते है.

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